
Mandbudhhi Novel by Vaibhav Mathur | Pankti Prakashan
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क्या जो स्त्री दुनिया के बनाए नियमों को नहीं समझती, वह सचमुच मंदबुद्धि है, या दुनिया ही उसे समझने में नाकाम है?
वैभव माथुर का उपन्यास ‘मंदबुद्धि’ एक ऐसी स्त्री की कहानी है, जिसे दुनिया के तौर-तरीक़े समझ नहीं आते। स्त्री और पुरुष के लिए समाज ने जो सीमाएँ तय कर रखी हैं, वह उन्हें सहजता से स्वीकार नहीं कर पाती। वह हर बात को अपने तर्क और विवेक की कसौटी पर परखती है। शायद इसीलिए, जो समाज उसकी सोच को समझ नहीं पाता, वह उसे मंदबुद्धि कहकर ख़ारिज कर देता है।
लेकिन कहानी तब एक नया मोड़ लेती है, जब उसका सामना उस पितृसत्तात्मक व्यवस्था से होता है, जो सदियों से स्त्रियों की स्वतंत्रता, इच्छाओं और निर्णय लेने के अधिकार को नियंत्रित करती आई है। इन परिस्थितियों में एक डॉक्टर उसके साथ खड़ा होता है और उसका संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक मान्यताओं और स्थापित धारणाओं को चुनौती देने लगता है।
‘मंदबुद्धि’ एक काल्पनिक कहानी है, जो पाठक को एक अलग दुनिया में ले जाती है और कई असहज सवालों से रूबरू कराती है। क्या समाज से अलग सोचना कमज़ोरी है? क्या हर परंपरा सही होती है? और क्या किसी इंसान को समझने के बजाय उसे कोई नाम दे देना आसान नहीं होता?
पंक्ति प्रकाशन से प्रकाशित यह उपन्यास उन पाठकों के लिए है, जो स्त्री-स्वतंत्रता, पितृसत्ता और सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल उठाने वाली कहानियाँ पढ़ना पसंद करते हैं।